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छत्तीसगढ़: MTech की कक्षाएं तत्काल बंद करने आदेश, इंजीनियरिंग कॉलेज भी जीरो ईयर


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Jabalpur:

अंबिकापुर. संत गहिरा गुरु विश्वविद्यालय की मुश्किलें कम होती नजर नही आ रही है. राज्य सरकार द्वारा धारा 52 के तहत कुलपति को हटाने की अनुशंसा के साथ ही एक नई समस्या खड़ी हो गई है. अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद ने विश्वविद्यालय इंजीनियरिंग कॉलेज में एमटेक की कक्षाओं को सुविधाओं के अभाव में तत्काल बंद करने का आदेश जारी कर दिया है. नए शिक्षा सत्र 2020-2021 के लिए इंजिनियरिंग कॉलेज को जीरो ईयर घोषित कर दिए जाने से विद्यार्थियों का भविष्य भी अधर में लटक गया है. कुप्रबन्धन और विश्वविद्यालय के अड़ियल रवैये को इस परिस्थिति के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है. विश्विद्यालय इंजीनियरिंग कॉलेज का संचालन लखनपुर के दान और जुगाड़ के भवन में किया जा रहा है.

विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अंबिकापुर के पॉलिटेक्निक कॉलेज परिसर में उधार के दो कमरों में सबसे पहले इंजीनियरिंग कॉलेज की कक्षाएं शुरू की गई थी. बाद में लखनपुर में दान का भवन मिलने पर इंजीनियरिंग कॉलेज का संचालन वही आरंभ कर दिया गया था.

शुरुआती कई वर्षों तक इंजीनियरिंग कॉलेज का संचालन अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के मानकों के विपरीत शैक्षिक विश्वविद्यालय के अधीन होता रहा. विद्यार्थियों के विरोध प्रदर्शन के बाद प्रबंधन ने अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद से मान्यता ली थी.

शिक्षा सत्र 2016 -17 में एआईसीटीई ने 2 वर्ष में स्वयं के भवन सहित अन्य सुविधाएं विकसित कर लिए जाने के वादे पर इंजीनियरिंग कॉलेज को सशर्त मान्यता प्रदान की थी. बीते 13 नवंबर 2019 को एआईसीटीई की स्टैंडिंग हियरिंग कमेटी के सदस्यों ने विश्वविद्यालय इंजीनियरिंग कॉलेज का निरीक्षण किया.

विश्वविद्यालय प्रबंधन ने एआईसीटीई के पोर्टल पर जो सुविधाएं कॉलेज में होने का उल्लेख किया था उसका भौतिक सत्यापन किया गया. विश्वविद्यालय प्रबंधन द्वारा एआईसीटीई के पोर्टल पर गलत जानकारियां दे दी गई थी. यहां भौतिक सत्यापन में वे सारी सुविधाएं नहीं पाई गई.

आखिरकार एआईसीटीई ने सुविधाओं की कमी को देखते हुए इंजीनियरिंग कॉलेज में संचालित एमटेक की कक्षाओं को तत्काल बंद करने का आदेश जारी कर दिया और शिक्षा सत्र 2020- 21 के लिए इंजीनियरिंग कॉलेज को जीरो ईयर घोषित कर दिया.

इसका साफ मतलब है कि नए शिक्षा सत्र में इन रिंग कॉलेज में एमटेक में अध्ययनरत विद्यार्थियों को परेशानियों का सामना करना पड़ेगा .उनके संबंध में एआईसीटीई की रिपोर्ट में किसी प्रकार का कोई उल्लेख नहीं किया गया है.नए सत्र में यहां विद्यार्थियों का प्रवेश भी नही होगा.

कॉलेज में नही मिला एक भी विद्यार्थी

एआईसीटीई के स्टैंडिंग हियरिंग कमेटी के तीन सदस्यीय दल के निरीक्षण के दौरान विश्वविद्यालय इंजियनियरिंग कॉलेज में एक भी विद्यार्थी उपस्थित नहीं पाया गया था. ना सही तरीके से लैब संचालित पाया गया और न ही एआईसीटीई के दूसरे मानक पूरे पाए गए.

फैकल्टी की कमी तथा स्थाई प्राचार्य की पदस्थापना नहीं होने को भी इस परिस्थिति के लिए जिम्मेदार बताया गया. कॉलेज में एक भी प्रोफेसर नहीं है. एसोसिएट प्रोफेसर के अलावा असिस्टेंट प्रोफेसर के भरोसे इसका संचालन किया जा रहा है, इसे भी मानक के विपरीत पाया. 2 वर्ष में स्वयं का भवन नहीं बना पाने वाले प्रबंधन ने इंजीनियरिंग कॉलेज की ड्राइंग डिजाइन भी स्टैंडिंग हेयरिंग कमेटी के समक्ष प्रस्तुत नहीं की.

सुर्खियों में था प्राचार्य व कुलपति का विवाद

इंजियनियरिंग कॉलेज में 48 टीचिंग स्टाफ के साथ प्राचार्य के पद पर डॉ आरएन खरे की नियुक्ति की गई थी. प्राचार्य और कुलपति का विवाद भी सुर्खियों में था. प्रबंधन ने प्राचार्य को निलंबित कर विश्वविद्यालय में संबद्ध कर दिया था लेकिन एआईसीटीई के पोर्टल पर दी गई जानकारी में इस बात का उल्लेख कर दिया गया कि 18 अगस्त 2018 से यहां प्राचार्य पदस्थ नहीं है जबकि स्थाई प्राचार्य की नियुक्ति की गई थी यदि सही जानकारी प्रबंधन दे देता तो दिक्कत शायद नहीं आती क्योंकि कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि 1 वर्ष से अधिक समय से यहां स्थाई प्राचार्य पदस्थ नहीं है.

15 करोड़ का मिला था प्रोजेक्ट

एआईसीटीई द्वारा जीरो ईयर घोषित किए जाने से ना सिर्फ बच्चों का भविष्य अधर में लटक गया है बल्कि यहां अध्ययनरत विद्यार्थियों को आगे की पढ़ाई में दिक्कत आएगी. केंद्र सरकार के तकनीकी शिक्षा गुणवत्ता अभियान के तहत मिला 15 करोड़ का प्रोजेक्ट बंद हो जाएगा. इसके अलावा देश की प्रतिष्ठित कंपनियों का प्लेसमेंट भी नहीं होगा. कॉलेज की छवि धूमिल होगी. केंद्र सरकार से अनुदान मिलना भी बंद हो जाएगा.

तकनीकी विवि से सम्बद्ध नही

इंजीनियरिंग कॉलेज को तकनीकी शिक्षा विश्वविद्यालय भिलाई से संबद्धता के लिए विद्यार्थी लंबे समय से मांग कर रहे थे लेकिन राजस्व का सबसे सशक्त माध्यम होने के कारण विश्वविद्यालय प्रबंधन इंजीनियरिंग कॉलेज को तकनीकी शिक्षा विश्वविद्यालय के अधीन करने राजी ही नहीं हुआ.

एकेडमिक विश्वविद्यालय से मिलने वाली डिग्री विद्यार्थियों के लिए किसी काम की नहीं थी. शासकीय अथवा निजी क्षेत्र की कंपनियों में नौकरी के दौरान यहां के विद्यार्थियों को इसलिए मौका नहीं दिया जाता था कि इनकी डिग्री एकेडमिक विश्वविद्यालय से जारी होती थी विद्यार्थियों के बढ़े दबाव के कारण प्रबंधन ने एआईसीटीई से मान्यता ली थी वह भी अब समाप्त हो चुकी है.